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जब हर मिनट मायने रखता है: कैसे टेक्नोलॉजी बदल रही है महिलाओं की सुरक्षा

Updated on: 23 July, 2026 12:55 PM IST | Mumbai
Bespoke Stories Studio | bespokestories@mid-day.com

मुंबई लोकल में महिलाओं की सुरक्षा बढ़ाने वाली नई SOS टेक्नोलॉजी कैसे तेज़ और सटीक मदद पहुंचाने में मदद कर रही है।

Reeva Sakaria, Co-founder of Yatri.

Reeva Sakaria, Co-founder of Yatri.

जब कोई महिला खुद को असुरक्षित महसूस करती है, तो कुछ मिनट भी बहुत लंबे लग सकते हैं। लेकिन अगर टेक्नोलॉजी उस इंतज़ार को छोटा कर दे तो?


मुंबई की लोकल रेलवे दुनिया के सबसे व्यस्त कम्यूटर नेटवर्क्स में से एक है। हर दिन यहां करीब 80 लाख यात्री सफर करते हैं, जिनमें 30 लाख से ज़्यादा महिलाएं शामिल हैं। वहीं, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) के जवान दिन-रात स्टेशनों और ट्रेनों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात रहते हैं।

लेकिन इतने बड़े नेटवर्क में किसी एक महिला तक सही समय पर मदद पहुंचाना उतना आसान नहीं है, जितना सुनने में लगता है। रेलवे में इमरजेंसी किसी एक जगह नहीं होती, बल्कि हर पल अपनी जगह बदलती रहती है। हर मिनट ट्रेनें सैकड़ों स्टेशनों से गुजरती हैं और हजारों यात्री चढ़ते-उतरते रहते हैं। ऐसे में अगर किसी महिला को अचानक मदद की ज़रूरत पड़े, तो कुछ ही मिनटों में ट्रेन कई स्टेशन आगे निकल चुकी होती है। ऐसे समय सबसे पहला सवाल यही होता है - वह इस वक्त है कहां?


मेरा मानना है कि यहीं पर पब्लिक ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी का अगला बड़ा बदलाव आ सकता है। पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल इनोवेशन ने यात्रा को काफी आसान बनाया है। जर्नी प्लानिंग, लाइव ट्रेन ट्रैकिंग और डिजिटल टिकटिंग जैसी सुविधाओं ने सफर को ज़्यादा भरोसेमंद बनाया है। अब अगला कदम है इमरजेंसी के समय मदद को और तेज़ बनाना, ताकि रेस्पॉन्डर्स के पास सही समय पर सही जानकारी मौजूद हो।

ज़रा सोचिए, एक महिला ऑफिस से देर रात घर लौट रही है। दो स्टेशनों के बीच ट्रेन में कोई यात्री ऐसा व्यवहार करने लगता है जिससे वह असहज महसूस करती है। वह तुरंत अपना फोन निकालती है। लेकिन उस वक्त शायद उसे यह भी पता न हो कि ट्रेन किस स्टेशन को पार कर चुकी है, किस दिशा में जा रही है या घबराहट में वह यह कैसे बताए कि आखिर वह है कहां।

कुछ समय पहले तक ऐसी स्थिति में मदद पहुंचाने वालों को सबसे पहले यही पूछना पड़ता था-महिला किस ट्रेन में चढ़ी? ट्रेन अभी कहां है? अगला स्टेशन कौन-सा है? इन सवालों के जवाब फोन कॉल्स और अंदाज़ों के आधार पर जुटाए जाते थे। लेकिन तब तक ट्रेन लगातार आगे बढ़ती रहती थी और उसके साथ वह महिला भी, जिसे मदद की ज़रूरत थी।

आज टेक्नोलॉजी इस पूरी प्रक्रिया को बदल रही है। हाल ही में सेंट्रल रेलवे, रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स (RPF) और Yatri ऐप के सहयोग से मुंबई लोकल नेटवर्क पर एक ऐसी डिजिटल सुविधा विकसित की गई है, जो इमरजेंसी रिस्पॉन्स को और तेज़ बना सकती है। फिलहाल रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक उपलब्ध इस SOS सुविधा के ज़रिए कंट्रोल रूम को महिला की लाइव लोकेशन, ट्रेन नंबर और संपर्क जानकारी सुरक्षित तरीके से मिल जाती है, जिससे तुरंत मदद की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

एक यात्री के लिए SOS बटन दबाने में सिर्फ एक सेकंड लगता है। लेकिन उस एक टैप के पीछे काफी जटिल टेक्नोलॉजी काम करती है।

इस सिस्टम की सबसे अहम तकनीकों में से एक है जियोफेंसिंग। इसके तहत हर स्टेशन और उसके आसपास के रेलवे क्षेत्र के लिए एक वर्चुअल सीमा तय की जाती हैSOS । सुविधा सिर्फ रेलवे परिसर और रेलवे ट्रैक से करीब 150 मीटर के दायरे में ही काम करती है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि अलर्ट वास्तव में रेलवे क्षेत्र से ही आया है। इससे RPF उन घटनाओं पर तुरंत कार्रवाई कर सकती है जहां उसकी सीधी भूमिका होती है, साथ ही गलत इस्तेमाल की संभावना भी कम हो जाती है।

हालांकि सिर्फ लोकेशन जान लेना काफी नहीं होता। GPS यह बता सकता है कि कोई व्यक्ति कहां है, लेकिन यह नहीं बता सकता कि वह अप लाइन में सफर कर रही है या डाउन लाइन में, ट्रेन किस दिशा में जा रही है या उसने कौन-सी ट्रेन पकड़ी है।

इस चुनौती का समाधान लाइव लोकेशन को रेलवे मैपिंग और ऑपरेशनल इंटेलिजेंस के साथ जोड़कर किया जाता है। इससे सिस्टम यह पहचान सकता है कि यात्री उस समय किस ट्रेन में मौजूद है। यानी रेस्पॉन्डर्स को सिर्फ मैप पर एक लोकेशन नहीं मिलती, बल्कि पूरी स्थिति समझने लायक जानकारी मिलती है।

इससे इमरजेंसी को संभालने का तरीका पूरी तरह बदल जाता है। महिला की लोकेशन ढूंढने में समय गंवाने के बजाय RPF कंट्रोल रूम तुरंत उससे संपर्क कर सकता है, ट्रेन की मूवमेंट पर नज़र रख सकता है और उसकी लाइव लोकेशन के आधार पर सबसे नज़दीकी टीम को भेज सकता है। जब अंदाज़ों की जगह रियल-टाइम जानकारी मिलती है, तो सबसे ज़रूरी काम यानी जल्द से जल्द मदद पहुंचाना काफी आसान हो जाता है।

यह सुविधा सिर्फ चलती ट्रेनों तक सीमित नहीं है। कई बार महिलाओं को देर रात प्लेटफॉर्म पर इंतज़ार करते समय, फुट ओवर ब्रिज पार करते हुए या स्टेशन के अंदर आते-जाते समय भी मदद की ज़रूरत पड़ सकती है। अगर सिस्टम को यह पता हो कि अलर्ट रेलवे परिसर के किस हिस्से से आया है, तो उसी हिसाब से सहायता तुरंत भेजी जा सकती है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि ऐसी तकनीक दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण पब्लिक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क्स में से एक मुंबई लोकल के लिए विकसित की जा रही है। रोज़ाना लाखों यात्रियों, लगातार चलती ट्रेनों और बेहद तेज़ ऑपरेशंस वाले इस नेटवर्क में भरोसेमंद टेक्नोलॉजी बनाना सिर्फ GPS से संभव नहीं है। इसके लिए जियोस्पेशियल इंटेलिजेंस, रेलवे मैपिंग, रियल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग और भारतीय रेलवे की ज़रूरतों के मुताबिक तैयार किए गए सिस्टम की ज़रूरत होती है।

महिलाओं की सुरक्षा के लिए टेक्नोलॉजी का यह सफर अभी शुरुआत भर है। आगे चलकर ऐसी सुविधाएं भी विकसित की जा सकती हैं, जिनमें SOS के दौरान महिला के भरोसेमंद परिवार के सदस्य या इमरजेंसी कॉन्टैक्ट्स को भी सुरक्षित तरीके से अलर्ट और लाइव लोकेशन मिल सके। इससे एक तरफ जहां प्रशिक्षित अधिकारी अपना काम करते रहेंगे, वहीं परिवार भी स्थिति से लगातार अपडेट रहेगा। जब टेक्नोलॉजी संस्थागत मदद और अपनों के भरोसे दोनों को साथ जोड़ती है, तब उसका असर और बढ़ जाता है।

यही पब्लिक सेफ्टी टेक्नोलॉजी का भविष्य है। अब टेक्नोलॉजी का काम सिर्फ यात्रियों को रास्ता दिखाना नहीं होना चाहिए। उसे लाइव लोकेशन, रेलवे इंटेलिजेंस, सुरक्षित कम्युनिकेशन और ऑपरेशनल जानकारी को जोड़कर फर्स्ट रेस्पॉन्डर्स को तेज़ और बेहतर फैसले लेने में मदद करनी चाहिए, खासकर तब जब हर सेकंड मायने रखता हो।

बेशक, टेक्नोलॉजी कभी भी RPF जवानों की समझ, अनुभव और साहस की जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह उनकी ताकत को और बढ़ा सकती हैअनिश्चितता कम करके, रिस्पॉन्स टाइम घटाकर और उन्हें सही समय पर सही जानकारी देकर। क्योंकि जब कोई महिला मदद के लिए हाथ बढ़ाए, तो पहला सवाल यह नहीं होना चाहिए -

"आप कहां हैं?"

बल्कि यह होना चाहिए

"हमने आपको ढूंढ लिया है। मदद रास्ते में है।"

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