Updated on: 23 September, 2025 06:59 PM IST | Mumbai
Hindi Mid-day Online Correspondent
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि यह चलन है, जहाँ धन की वसूली के लिए आपराधिक मामले दर्ज कराते हैं.
सुप्रीम कोर्ट. फ़ाइल/तस्वीर
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अदालतें वसूली एजेंट के रूप में कार्य नहीं कर सकतीं और विवादित पक्षों द्वारा दीवानी विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति की निंदा की. एक न्यूज एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कि बकाया राशि की वसूली के लिए गिरफ्तारी की धमकी का सहारा नहीं लिया जा सकता, कहा कि यह हाल के दिनों का चलन है, जहाँ पक्षकार धन की वसूली के लिए आपराधिक मामले दर्ज कराते हैं, जो विशुद्ध रूप से एक दीवानी विवाद है.
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रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में उत्पन्न एक आपराधिक मामले में सोमवार को सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणियाँ कीं, जहाँ पीठ ने कहा कि धन की वसूली को लेकर हुए विवाद में एक व्यक्ति पर अपहरण के आरोप लगाए गए थे. उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने ऐसी शिकायतों में वृद्धि की ओर इशारा किया और कहा कि इस तरह के मामलों में पुलिस बीच में फंस जाती है क्योंकि अगर वह उस मामले को दर्ज नहीं करती जहाँ संज्ञेय अपराध का आरोप लगाया गया है, तो अदालत उसे फटकार लगाती है और अगर वह मामला दर्ज करती है, तो उस पर पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने और कानून की उचित प्रक्रिया का पालन न करने का आरोप लगाया जाता है.
उन्होंने कहा कि आमतौर पर इन शिकायतों में, धन वसूली के विवाद में आपराधिक मामला दर्ज होने का आरोप लगाया जाता है. रिपोर्ट के अनुसार न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि वह पुलिस की दुविधा को समझते हैं और उन्होंने कहा कि यदि संज्ञेय अपराध के आरोप में प्राथमिकी दर्ज नहीं की जाती है, तो पुलिस को सर्वोच्च न्यायालय के 2013 के ललिता कुमार फैसले का पालन नहीं करने के लिए फटकार लगाई जाती है.
पीठ ने पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने से पहले यह देखने के लिए विवेक का प्रयोग करने की सलाह देते हुए कि मामला दीवानी है या फौजदारी, कहा कि आपराधिक कानून का ऐसा दुरुपयोग न्याय प्रणाली के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है. न्यायमूर्ति कांत ने कहा, "अदालतें बकाया राशि वसूलने के लिए पक्षकारों के लिए वसूली एजेंट नहीं हैं. न्यायिक प्रणाली के इस दुरुपयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती." रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष अदालत ने नटराज को सुझाव दिया कि राज्य प्रत्येक जिले के लिए एक नोडल अधिकारी, अधिमानतः एक सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश, नियुक्त कर सकते हैं, जिनसे पुलिस यह जानने के लिए परामर्श कर सकती है कि यह दीवानी है या फौजदारी, और उसके बाद कानून के अनुसार आगे बढ़ सकती है. पीठ ने नटराज को निर्देश प्राप्त करने और दो सप्ताह में अदालत को अवगत कराने को कहा. शीर्ष अदालत हाल ही में बार-बार इस प्रवृत्ति पर चिंता जता रही है कि पक्षकार अपनी शिकायतों के शीघ्र निपटान के लिए दीवानी विवादों में आपराधिक मामले दर्ज करा रहे हैं.
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